22 फरवरी 2012
नई दिल्ली। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद ने 31 मार्च को समाप्त हो रहे मौजूदा वित्त वर्ष के दौरान देश की आर्थिक विकास दर बढ़कर 7.1 प्रतिशत होने की सम्भावना जताई है। साथ ही यह भी कहा कि यदि वैश्विक परिस्थितियां सामान्य रहीं तो अगले वित्त वर्ष में यह बढ़कर आठ प्रतिशत हो सकती है। परिषद के अध्यक्ष सी. रंगराजन ने वर्ष 2011-12 की आर्थिक समीक्षा रिपोर्ट जारी करते हुए कहा, "यदि वैश्विक परिस्थितियां सामान्य रहीं तो हम आठ प्रतिशत की विकास दर हासिल कर सकते हैं।"
परिषद की समीक्षा रिपोर्ट में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की जो विकास दर 7.1 प्रतिशत रहने की सम्भावना जताई है, वह इस माह की शुरुआत में पेश किए गए केंद्रीय सांख्यिकी संगठन के 6.9 प्रतिशत के आकलन से थोड़ी ही अधिक है। यह हालांकि बजट लक्ष्य के मुकाबले काफी कम है, जिसमें विकास दर नौ प्रतिशत के आसपास रहने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था।
समीक्षा रिपोर्ट में महंगाई दर में गिरावट का अनुमान भी जताया गया है। इसके अनुसार, मौजूदा वित्त वर्ष के आखिर तक यह गिरकर 6.5 प्रतिशत रह सकता है। वित्त वर्ष 2012-13 के दौरान इसमें और गिरावट आ सकती है और यह 5-6 प्रतिशत के आसपास रह सकता है।
रंगराजन ने कहा, "महंगाई दर में पिछले वर्ष नवम्बर में गिरावट आने की शुरुआत हुई थी और इस साल जनवरी में इसमें भारी गिरावट देखी गई। मार्च 2012 के आखिर तक यह 6.5 प्रतिशत रहने का अनुमान है। भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीतियों तथा अन्य सार्वजनिक नीतियों का इस पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ने का अनुमान है।"
उन्होंने कहा कि कृषि एवं निर्माण क्षेत्र में भी वृद्धि दर इस माह की शुरुआत में पेश किए गए केंद्रीय सांख्यिकी संगठन के आकलन से ऊंची रहने का अनुमान है।
आर्थिक समीक्षा रिपोर्ट के अनुसार, कृषि क्षेत्र में विकास दर 2.5 प्रतिशत के पूर्व आकलन की तुलना में तीन प्रतिशत तक पहुंच सकती है। इसी तरह विनिर्माण क्षेत्र में 3.9 प्रतिशत वृद्धि की सम्भावना है, जबकि निर्माण क्षेत्र में 6.2 प्रतिशत तक विस्तार हो सकता है।
रंगराजन ने कहा, "वर्ष 2011-12 की पहली तिमाही में विनिर्माण एवं निर्माण क्षेत्र में मंदी का दौर देखा गया। चौथी तिमाही में इसमें सुधार हो सकता है।"
सेवा क्षेत्र में भी वृद्धि जारी रहेगी और यह वित्त वर्ष के आखिर में 9.4 प्रतिशत रह सकता है।
रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रंगराजन ने कहा कि वर्ष 2011-12 के दौरान निवेश काफी कम हुआ, जिसकी वजह से सकल स्थाई पूंजी निर्माण में गिरावट आई और पिछले चार साल में करीब चार प्रतिशत गिरावट के साथ यह 29.3 प्रतिशत पर पहुंच गया।
उन्होंने यह भी कहा कि वित्तीय घाटा जीडीपी के 4.6 प्रतिशत के बजट अनुमान से अधिक रह सकता है, क्योंकि खासकर पेट्रोलियम उत्पादों पर सब्सिडी बढ़ाई गई है।