न्यूज चैनल्स के कंटेट को लेकर लंबे समय से यह बहस चल रही है कि चैनल खबरों की वास्तविकता से दूर सनसनी फैलाकर लोगों का घ्यान खींचते हैं। ऐसा क्यों है और इसे रोकने के लिए क्या प्रयास किए जा रहे हैं, इसकी चर्चा कर रहे हैं वरिष्ठ टीवी पत्रकार और ब्राडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के सदस्य सुधीर चौधरी नीरज सिंह के साथ
खबरों के प्रसारण में हो रही लापरवाहियों को रोकने के लिए एनबीए क्या प्रयास कर रहा है?
न्यूज ब्रॉडकास्टिंग एसोसिएशन ने जस्टिस जे एस वर्मा की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई है, जिसमें चोकिला अय्यर और किरण कार्णिक जैसे लोग शामिल हैं। हर चैनल अपने वेबसाइट पर एक लिंक देता है, जिसमें आप चैनल के किसी कार्यक्रम को लेकर अपनी शिकायत या असहमति दर्ज करा सकते हैं। एसोसिएशन इन शिकायतों का ब्योरा चैनलों से मांगता है। एनबीए की तरह ही बीईए का गठन हुआ। इस एसोसिएशन के लोग एक-दूसरे के संपर्क में रहते हैं और संवेदनशील विषयों पर पहले आपस में सलाह करके ही प्रसारण करते हैं। इस तरह चैनल्स के भीतर एक सेल्फ रेगुलेशन काम करता है। कोशिश होती है कि सभी चैनल सामंजस्य स्थापित करें, लेकिन अगर किसी चैनल की एडिटोरियल पॉलिसी अलग है तो उस पर जोर भी नहीं डाला जा सकता।
आमतौर पर पत्रकारों पर भी ब्लैकमेलिंग के आरोप लगते रहे हैं, एनबीए इसे रोकने के लिए क्या प्रावधान कर रहा है?
चुनावों के दौरान आमतौर पर ऐसे मामले ज्यादा देखे गए कि पैसा लेकर खबरें प्लांट करने की शिकायतें आईं। इस दिशा में कदम उठाते हुए एनबीए और बीबीए ने यह तय किया है कि अगर ऐसा कोई मामला आता है जिसमें पैसा लेकर कमर्शियल स्पेस की जगह एडिटोरियल स्पेस बेचा गया हो तो एसोसिएशन उसे संज्ञान में लेगा। भविष्य में ऐसा न हो इसके लिए भी प्रयास हो रहे हैं।
चैनलों की बढ़ती संख्या को देखते हुए क्या ऐसे रेगुलेशन के प्रति आश्वस्त हुआ जा सकता है ?
देखिए, इतने बड़े देश में यह गारंटी तो किसी भी संस्थान के लिए नहीं ली जा सकती कि वहां कोई कमियां नहींहै। यह गारंटी तो सरकार पुलिस या प्रशासन के लिए भी नहींले सकती। दूसरे, भारत में प्राइवेट इलेक्ट्रानिक मीडिया अभी 14-15 साल पुराना है। कई पुरानी चुनौतियां हैं, जिनसे निपटा जा रहा है। कई बार नए हालात पैदा हो जाते हैं जिससे निकलने का कोई रास्ता नहींदिखता फिर भी कोशिश कर उससे बाहर आया जाता है। अभी आपने बातचीत में मेरे चैनल से जुड़े हुए स्टिंग आपरेशन वाले मामले का जिक्र किया उसके बाद से हम लोग सतर्क हो गए। अब एडिटोरियल फिल्टर के स्टेज बढ़ा दिए गए हैं। कई बार ऐसा होता है कि सूचनाएं ब्लैक एंड व्हाइट फॉर्म में न होकर ग्रे फॉर्म में होती हैं, तब गलतियां हो जाती हैं। लेकिन तब हमने बहादुरी से स्थितियों का सामना किया। ऐसे ही
हर चैनल के लोग कोशिश कर रहे हैं कि गलतियां न हों। बदलाव आएगा, थोड़ा समय दीजिए
ऐसा है तो मीडिया की भूमिका जो वॉचडॉग की थी, वह स्लमडॉग में क्यों बदल रही है?
मैं ऐसा नहीं मनता। हमारे देश में मीडिया की भूमिका हमेशा से सराहनीय रही है। लोग कह रहे हैं कि रुचिका और प्रियदर्शिनी जैसे हाई प्रोफाइल मामले में ही मीडिया जोर दिखाता है। आप बताइए, अगर राठौर लो प्रोफाइल होता तो कब का जेल में होता। हाई प्रोफाइल है, इसीलिए तो पकड़ा नहीं जा रहा था। मीडिया के कारण ही आज ऐसे कई बड़े मामले ख्रुल कर सामने आ रहे हैं। सौ प्रति सफल तो किसी भी क्षेत्र को नहींमाना जा सकता। फिर भी मीडिया कई बार लोगों की मदद के लिए सामने आया है।
लाइसेंसिंग प्रोसेस के लिए किन बदलावों की जरूरत है?
किसी भी कंपनी को लाइसेंस देते समय सरकार को सोचना चाहिए कि कंपनी का प्रोफाइल, बैकग्राउंड और मंशा क्या है। सरकार को यह भी देखना चाहिए कि कंपनी जिन प्रोफेशनल्स को ले रही है वे लोग कौन है। दूसरे, लाइसेंस रद करना तो सरकार के हाथ में है। सरकार को अगर यह लगता है कि चैनल नियम-कानूनों का उल्लंघन कर रहा है तो लाइसेंस रद कर दे।
सरकार न्यूज चैनलों के लिए जो रेगुलेट्री अथॉरिटी बनाने की बात कर रही है उससे क्या बदलाव आएंगे?
अगर सरकार कोई रेगुलेट्री अथॉरिटी लाती है तो पारदर्शिता में कमी ही आएगी। अगर ऐसा होता तो जो बड़े मामले आज उजागर हो रहे हैं सरकार उन्हें पहले ही दबा जाती। मीडिया के भीतर ही सेल्फ रेगुलेशन हो और सरकार मीडिया के नुमाइंदो को अपने विश्वास में लेकर उन्हें संयत और सही खबरें दिखाने को प्रेरित करे।