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शहर का व्यस्त चौराहा. शाम का समय, हर कोई भागता हुआ नजर आ रहा है. किसी को दूसरे की सुनने की फुर्सत नही. वाहनों के शोर और धुएँ से वातावरण में एक अजीव विषैलापन घुला हुआ. वहीं चौराहे की फुटपाथ पर एक बूढ़ा अपने बचे हुए फलों का टोकरा समेटे बैठा है. टोकरे का वजन
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बारिश के दिन गाँव में अजीब होते हैं. सफेद झक दिखने वाले टीबों पर हरी फसल लहलहाती है लेकिन सूखे मरुस्थल में बारिश होती भी कभी कभार है. पिछले कुछ सालों में तो बारिश और भी
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बेटे बहू को बात करते देख रिड़मल मौके से खिसक लिया और अपनी खटिया पर जाकर लेट गया.
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स्कॉच का आधा पैग लेते-लेते नीरू की आँखें चढ़ आयी थीं और बातचीत में हिचकियाँ घुलने मिलने लगीं. अजय नीरू को एकटक ताके जा रहा था. तभी सन्नाटे को तोड़ती हुई नीरू बोल उठी
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यह भी रोजाना की तरह था. बिस्तर पर आरामदायक एंगिल में लेटकर लैपटॉप पर इन्टर मार दिया. और mail की अथाह दुनिया सामने आ गई. तमाम बैंक वालों, इंश्योरेंस और शेयर से लाखों बना लेने वाले ई-मेलों के बीच नरेश जी का मेल फिर पढ़ा था. परसों फोन भी आया था. क्लिक करते ही डिजिटल खत का मजमून सामने था-रोमन में लिखी हुई हिन्दी-
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बात थोड़ी अजीब है और एक स्ट्रग्लिंग राइटर को तो ऐसा बिल्कुल नहीं कहना चाहिए लेकिन सच यही है कि मुझे नहीं पता कि ये कहानी कब की है. ना ही सही-सही लोकेशन मालूम है इस कहानी के घटनास्थल की. बस इतना पता है कि उस जमाने में एशिया, यूरोप, अफ्रीका और शायद अमेरिका महाद्वीप भी आपस में जुड़े हुए थे. आपने जरूर वो पुराने नक्शे देखे होंगे
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फर्स्ट सिनेमा से अमिताभ की ताजा फिल्म देखकर निकलता हूँ, सड़क लगभग वैसी ही है, जैसी बाहर से तीन के शो में घुसने से पहले थी, थोड़ी गीली जरूर है, लगता है बारिश हुई है, दूर तक नजर फैलाता हूँ तो विश्वास हो जाता है, सड़क के किनारे के पेड़ ताजा नहाये हुए लगते हैं, दुपहिया वाहनों पर लोग आधे भीगे से दिखते हैं और चैपहिया वाहनों के वाइपर अब भी फ्रंट ग्लासेज पर गतिमान हैं.
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पर नहीं, पर उड़ रहे हैं आसमानों पर और, पर वाले पड़े हैं पायदानों पर अब कहीं कुछ भी धआँए किस तरह, कहिए
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सुमन की आँखों से आँसुओं की मोटी धार बह निकली.
ब्लाउज में बहकर गए आँसुओं की धार से, वहाँ रखे गये कागज पर लिखे हर्फ-‘प्रेगनेंसी रिपोर्ट: पॉजिटिव’ -घुल-घुलकर बह रहे थे.
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खडंजे की ढाल, मुख्य सड़क से बायीं ओर घूमकर गिरती थी. आटो से उतरने के बाद सुमन, स्मृति भ्रंश के मरीज की तरह, ढाल के मुहाने पर बेमकसद खड़ी थीं.
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