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देहाती : उमेश चन्द्र सिंह Kathadesh
Umesh Chandra Singh
शहर का व्यस्त चौराहा. शाम का समय, हर कोई भागता हुआ नजर आ रहा है. किसी को दूसरे की सुनने की फुर्सत नही. वाहनों के शोर और धुएँ से वातावरण में एक अजीव विषैलापन घुला हुआ. वहीं चौराहे की फुटपाथ पर एक बूढ़ा अपने बचे हुए फलों का टोकरा समेटे बैठा है. टोकरे का वजन
बेटियों का घर - 2 : रामकुमार सिंह Kathadesh
रामकुमार सिंह
बारिश के दिन गाँव में अजीब होते हैं. सफेद झक दिखने वाले टीबों पर हरी फसल लहलहाती है लेकिन सूखे मरुस्थल में बारिश होती भी कभी कभार है. पिछले कुछ सालों में तो बारिश और भी
बेटियों का घर : रामकुमार सिंह Kathadesh
रामकुमार सिंह
बेटे बहू को बात करते देख रिड़मल मौके से खिसक लिया और अपनी खटिया पर जाकर लेट गया.
कस्बाई कन्फेशंस - फेल्ड मैसेज : अनुराग शुक्ला -2 Kathadesh
Anurag Shukla
स्‍कॉच का आधा पैग लेते-लेते नीरू की आँखें चढ़ आयी थीं और बातचीत में हिचकियाँ घुलने मिलने लगीं. अजय नीरू को एकटक ताके जा रहा था. तभी सन्नाटे को तोड़ती हुई नीरू बोल उठी
कस्बाई कन्फेशंस - फेल्ड मैसेज : अनुराग शुक्ला Kathadesh
Anurag Shukla
यह भी रोजाना की तरह था. बिस्तर पर आरामदायक एंगिल में लेटकर लैपटॉप पर इन्टर मार दिया. और mail की अथाह दुनिया सामने आ गई. तमाम बैंक वालों, इंश्योरेंस और शेयर से लाखों बना लेने वाले ई-मेलों के बीच नरेश जी का मेल फिर पढ़ा था. परसों फोन भी आया था. क्लिक करते ही डिजिटल खत का मजमून सामने था-रोमन में लिखी हुई हिन्दी-
डैन्यूब के पत्थर: वरुण Kathadesh
वरूण
बात थोड़ी अजीब है और एक स्ट्रग्लिंग राइटर को तो ऐसा बिल्कुल नहीं कहना चाहिए लेकिन सच यही है कि मुझे नहीं पता कि ये कहानी कब की है. ना ही सही-सही लोकेशन मालूम है इस कहानी के घटनास्थल की. बस इतना पता है कि उस जमाने में एशिया, यूरोप, अफ्रीका और शायद अमेरिका महाद्वीप भी आपस में जुड़े हुए थे. आपने जरूर वो पुराने नक्शे देखे होंगे
प्रेम की उपकथा : दुष्यन्त Kathadesh
dushyant
फर्स्‍ट सिनेमा से अमिताभ की ताजा फिल्म देखकर निकलता हूँ, सड़क लगभग वैसी ही है, जैसी बाहर से तीन के शो में घुसने से पहले थी, थोड़ी गीली जरूर है, लगता है बारिश हुई है, दूर तक नजर फैलाता हूँ तो विश्वास हो जाता है, सड़क के किनारे के पेड़ ताजा नहाये हुए लगते हैं, दुपहिया वाहनों पर लोग आधे भीगे से दिखते हैं और चैपहिया वाहनों के वाइपर अब भी फ्रंट ग्लासेज पर गतिमान हैं.
गजल : नूर मुहम्मद ‘नूर’ Kathadesh
नूर मुहम्मद ‘नूर’
पर नहीं, पर उड़ रहे हैं आसमानों पर और, पर वाले पड़े हैं पायदानों पर अब कहीं कुछ भी धआँए किस तरह, कहिए
हत्‍या : किरन सिंह - 2 Kathadesh
kiran Singh
सुमन की आँखों से आँसुओं की मोटी धार बह निकली. ब्लाउज में बहकर गए आँसुओं की धार से, वहाँ रखे गये कागज पर लिखे हर्फ-‘प्रेगनेंसी रिपोर्ट: पॉजिटिव’ -घुल-घुलकर बह रहे थे.
हत्‍या : किरन सिंह Kathadesh
kiran Singh
खडंजे की ढाल, मुख्य सड़क से बायीं ओर घूमकर गिरती थी. आटो से उतरने के बाद सुमन, स्मृति भ्रंश के मरीज की तरह, ढाल के मुहाने पर बेमकसद खड़ी थीं.
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इंटरव्यू
कला के बीच नहीं आ सकतीं मजहब की दीवारें: बि‍रजू महाराज
कथक का पर्याय हैं बिरजू महाराज। 72 साल की उम्र में भी उनके हौसले जवां हैं। नृत्य उनके लिए साधना है, जिसमें लीन होने के बाद उनके पैरों की थाप से एक नयी दुनिया सजती है। कथक की धारा के साथ बहते-बहते कब वो बृजमोहन नाथ मिश्रा से पंडित बिरजू महाराज हो गये उन्हें खुद भी पता नहीं चला। नई पौध को कथक की बारीकियों से सजाने-संवारने में उन्हें बहुत आनंद आता है। उनसे खास बात की प्रतिभा कटियार ने।
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ज्योतिष