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दलित विमर्श - बांग्ला दलित लेखन Kathadesh
बजरंग बिहारी तिवारी
दलित विमर्श - बांग्ला दलित लेखन
रिपोर्ताज - जादू टोनों के देस की कुछ कतरनें Kathadesh
ओमा शर्मा
रिपोर्ताज - जादू टोनों के देस की कुछ कतरनें
कविता – हे राम! Kathadesh
नंद किशोर
कविता – हे राम!
कथादेश (अक्टूबर 2009) Kathadesh
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विख्यात साहित्यिक पत्रिका कथादेश पहली बार इंटरनेट पर। पढ़िए अक्टूबर २००९ का अंक।
अनुगूंज - पाठकों के पत्र Kathadesh
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अनुगूंज - पाठकों के पत्र
रंगमंच - रचना प्रक्रिया के पड़ाव Kathadesh
देवेन्द्र राज अंकुर
रंगमंच - रचना प्रक्रिया के पड़ाव
कहानी - बेविकल्प (2) Kathadesh
आशुतोष भारद्वाज
कहानी - बेविकल्प (2)
कहानी - बेविकल्प Kathadesh
आशुतोष भारद्वाज
नहीं ही है मेरे पास कोई विकल्प नहीं ही था कभी कोई विकल्प, विकल्प मैं चाहता था भी नहीं. विकल्पों में जीते हैं जो वे या तो हैं व्यापारी या व्यभिचारी. होना किसी भी चीज के विकल्प का कर देता है तब्दील उसे व्यापार या व्यभिचार में. नहीं थे मेरे पास विकल्प इसलिए मैं था एक हत्यारा. नहीं था मेरे लिए संभव बचे रहने दूँ अपने शिकार को...
कवियन की वार्ता - द्याखौ सारे को हम ही से पूछ रहा है Kathadesh
विश्वनाथ त्रिपाठी
निराला जी के स्वभाव में परस्पर-विरोध भी था. कभी इतने आक्रामक हो जाते कि सामने वाले की बोलती बंद हो जाती. कभी इतने निरीह और उदार हो जाते कि देवता लगते. वस्तुत: इसके पीछे कोई न कोई कारण होता. जीवन की विषम स्थितियाँ इसके लिए जिम्मेदार थीं. वाइस चांसलर और अनेक हिन्दी कवियों के संरक्षक प्रो. अमरनाथ झा ने अपने यहाँ काव्य-पाठ के लिए बुलाया तो उनके घर नहीं गये...
यायावर की डायरी – पिता मुझे क्षमा कर देना Kathadesh
सत्यनारायण
घोर अंधियारी रात हो या जेठ की जलती दुपहरी. उजाड़ में बसे उस बंगले में वह बुढ्ढा पिछले एक कम चालीस बरस से अपनी काया को बंगले के लेवड़ों के साथ गलाता आ रहा है. कपड़ों से लेकर बालों तक की सफेदी में खोयी उसकी काया लठ्ठे की कमीज पर उधड़े बदनुमा चकत्तों से भरी हुई थी. और गीड़ से भरी आँखें हवा से हिलते कमेड़ी के घौंसले की तरह हिलती डुलती रहती थी...
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कला के बीच नहीं आ सकतीं मजहब की दीवारें: बि‍रजू महाराज
कथक का पर्याय हैं बिरजू महाराज। 72 साल की उम्र में भी उनके हौसले जवां हैं। नृत्य उनके लिए साधना है, जिसमें लीन होने के बाद उनके पैरों की थाप से एक नयी दुनिया सजती है। कथक की धारा के साथ बहते-बहते कब वो बृजमोहन नाथ मिश्रा से पंडित बिरजू महाराज हो गये उन्हें खुद भी पता नहीं चला। नई पौध को कथक की बारीकियों से सजाने-संवारने में उन्हें बहुत आनंद आता है। उनसे खास बात की प्रतिभा कटियार ने।
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