|
दलित विमर्श - बांग्ला दलित लेखन
|
|
|
रिपोर्ताज - जादू टोनों के देस की कुछ कतरनें
|
|
|
|
 |
विख्यात साहित्यिक पत्रिका कथादेश पहली बार इंटरनेट पर। पढ़िए अक्टूबर २००९ का अंक।
|
|
|
|
|
रंगमंच - रचना प्रक्रिया के पड़ाव
|
|
|
|
|
नहीं ही है मेरे पास कोई विकल्प नहीं ही था कभी कोई विकल्प, विकल्प मैं चाहता था भी नहीं. विकल्पों में जीते हैं जो वे या तो हैं व्यापारी या व्यभिचारी. होना किसी भी चीज के विकल्प का कर देता है तब्दील उसे व्यापार या व्यभिचार में. नहीं थे मेरे पास विकल्प इसलिए मैं था एक हत्यारा. नहीं था मेरे लिए संभव बचे रहने दूँ अपने शिकार को...
|
|
|
निराला जी के स्वभाव में परस्पर-विरोध भी था. कभी इतने आक्रामक हो जाते कि सामने वाले की बोलती बंद हो जाती. कभी इतने निरीह और उदार हो जाते कि देवता लगते. वस्तुत: इसके पीछे कोई न कोई कारण होता. जीवन की विषम स्थितियाँ इसके लिए जिम्मेदार थीं. वाइस चांसलर और अनेक हिन्दी कवियों के संरक्षक प्रो. अमरनाथ झा ने अपने यहाँ काव्य-पाठ के लिए बुलाया तो उनके घर नहीं गये...
|
|
|
घोर अंधियारी रात हो या जेठ की जलती दुपहरी. उजाड़ में बसे उस बंगले में वह बुढ्ढा पिछले एक कम चालीस बरस से अपनी काया को बंगले के लेवड़ों के साथ गलाता आ रहा है. कपड़ों से लेकर बालों तक की सफेदी में खोयी उसकी काया लठ्ठे की कमीज पर उधड़े बदनुमा चकत्तों से भरी हुई थी. और गीड़ से भरी आँखें हवा से हिलते कमेड़ी के घौंसले की तरह हिलती डुलती रहती थी...
|
|