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बांगुर एवेन्यु का धमार्थ दवाखाना. रात में अक्षर धुंधले दिखते हैं इसलिए यहाँ आँख दिखाने आया हूँ. सुबह के छह बजे हैं और मैं कतार में 52 लोगों के पीछे खड़ा हूँ...
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सड़कवासी राम, न तेरा था कभी, न तेरा है कहीं, रास्तों दर रास्तों पर, पाँव के छापे लगाते ओ अहेरी, खोलकर मन के किवाड़े सुन. सुन कि सपने की, किसी सम्भावना तक में नहीं, तेरा अयोध्या धाम, सड़कवासी राम...
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नींद में डूबे इस पथरीले शहर के लोगों की मूसेड़ में हाथ घालकर यह आवाज उनको बेचैन करते हुए उनमें घुलमिल जाती है और सपनीले नशे में खोया मैं इस आवाज के सहारे रेत के धोरों पर बावले हुए एक अकेले खेजड़े के पत्ते सा रह रहकर काँप उठता हूँ. चौतरफ कंकरीट का जंगल, जंगल में काँटेदार लोग. लेकिन इनके भीतर घुसकर सबको बेधती फिर वही खम खाई आवाज...
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इस बार प्रतियोगिता हेतु प्राप्त हुई लघुकथाओं की संख्या देखकर हरिनारायण जी आश्वस्त थे कि अपेक्षाकृत अधिक रचनाएँ निर्णायकों के पास भेजी जा सकेंगी. पर अंततः उनके द्वारा अठारह रचनाओं का ही चयन किया जा सका यानी कुल प्राप्त रचनाओं का 3.5 प्रतिशत. कहना न होगा कि स्तरीय लघुकथाओं की खोज भुस के ढेर में से सुई ढूँढने समान है...
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आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी उन दिनों नाथ सिद्धों की बानियों का सम्पादन कर रहे थे. नाथ-सिद्धों की बानियों का संकलन इसी नाम से नागरी प्रचारणी सभा काशी से निकला भी है. प्राचीन हस्तलेखों से बानियों को देवनागरी में मैं और एक दूसरे छात्रा मदन मोहन पांडेय उतारते थे. प्रायः रोज शाम को पंडित जी उसे देखते गलतियाँ ठीक करते...
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इतिहास और अर्थव्यवस्था के जिस दौर में हम रह रहे हैं उसमें सांस्कृतिक पक्षों की अनदेखी सी की जा रही है. यह दीगर बात है हर तरह की अर्थव्यवस्था अपने साथ नयी तरह की संस्कृति या संस्कृतियाँ लेकर आती हं. जिस भूमंडलीकरण की बात आजकल हो रही है और जिसका असर हम अपने देश में भी लगातार देख रहे हैं वह भी कई प्रकार के सांस्कृतिक बदलावों को प्रस्तावित कर रहा है...
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जून 1977 में फिर एक बार लखनऊ और 7, 8, 10 जुलाई को ‘सामना: क्रमशः’ तीन शीर्षक से लक्रीस के साथ तीन कहानियों की प्रस्तुति. इनमें दो कहानियाँ कोरस और कबन्ध के रचनाकार थे दूधनाथ सिंह. ये दोनों कहानियाँ सरल या सीधी कहानियाँ नहीं थीं और न ही कहानीकार ने इन्हें सपाटशैली में लिखा है. कहानी में व्यक्त अमूर्त विचारों को मंच पर मूर्त करना कोई आसान काम नहीं था...
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पटना के रंगदर्शक सामाजिक सरोकारों और गहन मानवीय सम्वेदनाओं को अभिव्यक्त करनेवाले रंगकर्म के प्रति हमेशा उत्सुक रहे हैं. वे बहुत धीरज के साथ गम्भीर रंगप्रस्तुतियों की प्रतीक्षा करते हैं. यही कारण है कि उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भारतेन्दु के प्रभाव में आधुनिक रंगमंच की जो गम्भीर शुरुआत बाबू केशवराम भट्ट ने पटना नाटक मंडली की स्थापना से की थी, वह आज भी जारी है. भट्टजी का रंगमंच सन् अट्ठारह सौ सत्तावन के विद्रोह के बाद उपजी विषम स्थितियों और स्वतंत्रता की आकांक्षाओं को अभिव्यक्त करनेवाला राजनीतिक रंगमंच था...
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एक बार फिर से आप सबको ये बताना है कि राकेश प्रियदर्शी नाम के एक सज्जन बिहार विधान परिषद के कर्मचारी हैं और कविताएँ लिखते हैं. बिहार विधान परिषद में ही एक अधिकारी हैं योगेंद्र कृष्ण और वह भी कवि हैं. कविता, नौकरी के अलावा उनकी एक साप्ताहिक-मासिक गतिविधि है ब्लॉगिंग. बिहार विधान परिषद की हिंदी शाखा में, जहाँ ये दोनों ही लोग अपना दफ्तरी वक्त गुजारते हैं, करीब आधा दर्जन लेखक काम करते हैं...
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कल्याणी ठाकुर के चर्चित संग्रहों में ‘धर लेइ युद्ध सुनिश्चित’ तथा ‘जे में आधार गुने’ हैं. उनकी महत्त्वपूर्ण कविताओं में ‘जूता समाज’, ‘अन्नदास’, ‘अवसरवादी हमेशा मलाई खाता है’, ‘बाबा साहेब तुम्हारी दिशा में’, ‘शोषक और शोषित का संवाद’ आदि हैं...
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