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मैं भी खयालों में डूबते-उतराने बस में बैठ गयी. सोचती रही यह संसार दो चीजों से चलता है- उत्पादन और पुनरुत्पादन... दोनों पर औरतों को कोई अधिकार नहीं पुनरुत्पादन पर औरतों के कब्जे के लिए उत्पादन पर सर्वहारा के, कब्जा होने तक इन्तजार करना है. तब तक न जाने कितनी औरतों को कितना खून बह जाएगा और यह ‘शहादत’ किसी काम की नहीं...
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एक अच्छा सेल्समैन कभी भी ग्राहक के निजी राग-द्वेष की गिरफ्त में नहीं आता. वह ग्राहक के भावनात्मक आवेगों में संलिप्त नहीं होता बल्कि वह उनका अपनी लक्ष्य सिद्धि के लिए इस्तेमाल करता है. वह भावुकता का विक्रेय अभिनय करता है जैसे विज्ञापनी दुनिया का हर पात्र अनिवार्य तौर पर करता है. भावुकता और लगाव सिर्फ रैपर होते हैं जिनके भीतर जींस रखी जाती है. ये रैपर जितने ज्यादा चमकीले होते हैं भीतर की जींस उतना ही ज्यादा आभासीय सच की प्रतीति कराती है. तो तुम्हारे सेल्समैन की नजर इस पर नहीं है कि लड़की की भावनात्मक उद्विग्नता उससे क्या अपेक्षा करती है या लड़की उससे क्या चाहती है, बल्कि इस पर है कि वह स्वयं क्या चाहता है. लेकिन लड़की को वह हर पल यह अहसास कराता है कि उसे उसकी चिंता है और उसकी भावुकता रैपर नहीं बल्कि खुद एक जींस है.
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हाये लड़को, तुम लोग आदिवासियों के आदिम युग में नहीं बल्कि इक्कीसवीं सदी में जी रहे हो. इक्कीसवीं सदी के बाजार युग में. अगर तुम बाजार के सक्रिय हिस्से नहीं हो और अपनी और अपने उत्पाद की, अपने प्रोडक्ट की, मार्केटिंग नहीं कर सकते, उसकी बजारी नहीं कर सकते तो फिर क्या करोगे, कैसे खुशहाल जिंदगी जिओगे? इसके बिना तुम्हारी जिंदगी वैसी ही होगी जैसी रैम्प पर थिरकती खूबसूरत मॉडल की तुलना में झुग्गी की एक कचरा बीनती औरत की होती है.
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जब पलीतो ताई के दृश्य से अदृश्य हो जाने की खबर की पुष्टि हो गयी तब ताऊ सूरता पंडित पहुँचे ब्रह्माजी के साये में. वहाँ तो आदमियों के मुंड ही मुंड थे. मुंडों का यह होना उन्हें एक संस्कृति के होने जितना अच्छा लगता था. उन्हें चीरते हुए वे ब्रह्माजी के ठीक पास आ पहुँचे और वहाँ दंडवत होकर मन्त्रों का जाप करने लगे जो उनके खुद के सिवाय दूसरा कोई शायद ही समझ पाता होगा. फिर उन्होंने चबूतरे पर प्रवचन की मुद्रा में आसन जमाया.
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उस कॉलोनी के बाशिंदों को इस शिवराम पर बड़ा नाज था. उनके बीच वही एक पढ़ा लिखा और उत्साही युवक था. जब तक वह अपनी टाँगों के बल खड़ा था तब तक उनके लिए जीवन की बहुत सी उम्मीदें जिन्दा थीं. लेकिन जब वह समतल की जा रही उस जमीन पर टांग तुड़वाकर जा गिरा तो उनकी वे तमाम आशाएँ मिट्टी के लोंदे की तरह खाक हो र्गइं. इसी के साथ आलमगीर और उन सब दूसरे लोगों की हॉय-हॉय का शोर भी बन्द हो गया, जो खुद को इस, उस और सारी कौम के रखवाले मानते थे. उनका यह आखिरी दृश्य आलमगीर और उन दूसरे लोगों की सफलता का आगाज था जिनमें बहुत सारे आलमगीर के विरोधी होने के बावजूद उसकी इस कार्रवाही के भरपूर समर्थन पर थे जिसके तहत उसने यह ढारा कॉलोनी समतल बना दी थी. यानी वे इस पर एकमत थे. यही इस काम का सौन्दर्य था. दूत लोग अब एक दूसरे को और दंगा निरोधी बल को मुस्कुराते हुए मुबारिक पेश करते हुए अपने शरीर से इस श्रम से निकला पसीना पोंछ रहे थे.
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उस रात के बारे में उसने मुझे सिर्फ इतना बताया था कि उस रात गर्मी तो ज्यादा नहीं थी लेकिन उसके शरीर पर लगातार पसीने छूटता चल रहा था. यूँ तो पसीना ही ऐसी कोई चीज भी नहीं थी कि आज से पहले उसके इसी शरीर से न छूटा हो लेकिन इतना तेजी से और इस कदर कंट्रोल न किये जा सकने वाले ढंग से पहले कभी ऐसा हुआ हो उसे ठीक से याद नहीं आ पा रहा था.
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एक किस्म की विरक्ति मन में बस जाती है. मैं अपने अंदर के इस उजाड़ का जिक्र करता हूँ तो मेरी इकलौती बिटिया और एकमात्र दोस्त से यह सुनने को मिलता है-
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हरि सिंह में कई परस्पर विरोधी गुण थे. सुबह चार बजे उठकर पाठ करता था, गुरुद्वारे जाता था और साथ ही हनुमान जी की पूजा भी करता था. शराब अब नहीं पीता था, पर चूना और तम्बाकू खाया करता था. शायद दाँतों की बीमारी के कारण?सभी तरह की पुस्तकें पढ़ता और अपने को कवि कहता था. साधु-संतों और पंडितों-ज्योतिषियों पर भी खूब श्रद्धा रखता था.
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एक साहित्यिक पत्रिका में बिना किसी शिल्प और सौन्दर्य के इस जरूरी लग रहे मसले का जिक्र करने के लिए दलायु पाठकों से क्षमायाचना के साथ......
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कथादेश का अगस्त 2009 का मीडिया विशेषांक आपकी टीम द्वारा अति परिश्रम से तैयार किया महत्वपूर्ण संग्रहणीय ऐतिहासिक दस्तावेज बनेगा. इसकी सामग्री प्रामाणिक एवं आईना दिखाती है. मैं मुम्बई में पत्रकार हूँ. पर यहाँ का सम्पूर्ण मीडिया विशेषकर प्रिंट मीडिया पर पूर्णतः ब्राह्मणवादी नियंत्रण है. यदि आप ब्राह्मण वर्ग से हैं और आपमें पर्याप्त योग्यता नहीं भी है तो आगे बढ़ने एवं प्रगति के सारे रास्ते खुले हैं.
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