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लड़ाई का निशान
लड़ाई में हार गया तो
अश्व हो गया अस्वस्थ
मेरे घोड़े की पीठ पर
तलवार का निशान है
वह मुझे ही मिलना था.
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‘बार’ के पीछे
लुकुटिये पर बँधी
भारत निर्मित विलायती बकरी
उस भौ-गोलीकरण के बारे में
चतुर मिनमिनाई.
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नरक की छाती फाड़कर
एक चिनगारी
कँटीले पौधे के फूल
अपनी बपौती
धर्मशास्त्रों के सिर पर
फेंक देता हूँ.
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मलयालय दलित-लेखन में सर्वाधिक जगह कविता ने ली इसलिए इस बार हम (आसानी से सुलभ हो सकी कुछ) कविताओं से शुरुआत कर रहे हैं. अगले अंकों में हम अन्य विधाओं का अनुवाद देंगे और मलयालम दलित साहित्य का संक्षिप्त परिचयात्मक विकास क्रम भी पेश करेंगे.
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मेकअप धुल चुका था
आँसुओं से
रुलाई थी कि अभी तक दब नहीं पा रही थी
कान लगाने पर वैन के बाहर तक सिसकियाँ
सुनाई दे रही थीं
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उस पारदर्शी, तरल और धवल और सुरीले एकांत में प्रविष्ट होने के बाद
सच कहना क्या याद रहा तुम्हें?
वह संलाप जो हुआ था कभी मेरे और तुम्हारे बीच
‘नैतिक और अनैतिक के बीच झूलता अपराध बोध’
‘इतिहास को कुरेदना अनावश्यक’
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कहते हैं ऐसी कोई घड़ी नहीं जिसे भोंपू मियाँ दुरुस्त नहीं कर सकते थे
ख़राब से ख़राब घड़ी जो कभी न चली बरसों से
जिसके कल-पुर्जे सुई-काँटे जाम हो गये धूल-पानी-पसीने से
अचानक टिक-टिक करने लगती उनकी उँगलियों के इशारे से
आइग्लास के पीछे से तजवीज़ती उनकी बूढ़ी आँख
पकड़ लेती बारीक से बारीक नुक्स
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विख्यात साहित्यिक पत्रिका कथादेश पहली बार इंटरनेट पर। पढ़िए जनवरी 2010 का अंक।
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हम एक नई बहस शुरू करने जा रहे हैं. दलित रचनाकारों की तरह सवर्णों से ब्राह्मण को जातीय उत्पीड़न की आत्मकथाएँ क्यों नहीं लिखनी चाहिए. वर्ण व्यवस्था में दलितों की चेतना का ये हिस्सा ही नहीं बना कि उनके खिलाफ जातीय उत्पीड़न होता है. दलितों की लगभग प्रारम्भिक अवस्था में ही सवर्ण जातियों की नई पीढ़ी के सदस्य हैं जो अपने खिलाफ होने वाले जातीय प्रताड़ना का महसूस नहीं कर पाते जबकि जातीय प्रताड़ना के कारण ही वे आधुनिकता के साथ सहज और स्वाभाविक सम्बन्ध विकसित नहीं कर पाते हैं. कई सवर्ण लड़के अपने परिवार में जातीय उत्पीड़न की घटनाएँ सुनाते हैं तो उन्हें सुनकर मेरे रौंगटे खड़े हो जाते हैं. हालाँकि वे परिवार के भीतर जाति को लेकर सदस्यों के अलग-अलग दृष्टिकोण के संघर्षों के रूप में उनका बयां करते हैं. लेकिन मैं सोचता हूँ कि नये दौर के लड़के-लड़की के रूप में उन्हें देखा जाए तो उनके खिलाफ जातीय संघर्ष की गति को तेज करने में कारगर भूमिका अदा कर सकते हैं. आप इस बहस में दो तरह से हिस्सा ले सकते हैं. एक तो आत्मकथा लिखकर और दूसरा इस बहस में कुछ और बातों को जोड़कर इसे विस्तार दे सकते हैं.
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कबीर की कविता और उनके समय के बारे में पुरुषोत्तम अग्रवाल की किताब अकथ कहानी प्रेम की को राजकमल प्रकाशन ने अपनी षष्ठीपूर्ति के उपलक्ष्य में लखटकिया पाण्डुलिपि पुरस्कार योजना के अन्तर्गत पुरस्कृत करके चर्चा के केन्द्र में ला दिया है जिसकी वह उचित रूप से अधिकारिणी भी है.
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