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ए.अय्यप्पन की दो कविताएँ Kathadesh
ए.अय्यप्पन
लड़ाई का निशान लड़ाई में हार गया तो अश्व हो गया अस्वस्थ मेरे घोड़े की पीठ पर तलवार का निशान है वह मुझे ही मिलना था.
डॉ. एल. तोमसकुट्टी की तीन कविताएँ Kathadesh
डॉ. एल. तोमसकुट्टी
‘बार’ के पीछे लुकुटिये पर बँधी भारत निर्मित विलायती बकरी उस भौ-गोलीकरण के बारे में चतुर मिनमिनाई.
अपनी मिट्टी Kathadesh
के.के एस दास
नरक की छाती फाड़कर एक चिनगारी कँटीले पौधे के फूल अपनी बपौती धर्मशास्त्रों के सिर पर फेंक देता हूँ.
मलयालम दलित कविता Kathadesh
बजरंग बिहारी तिवारी
मलयालय दलित-लेखन में सर्वाधिक जगह कविता ने ली इसलिए इस बार हम (आसानी से सुलभ हो सकी कुछ) कविताओं से शुरुआत कर रहे हैं. अगले अंकों में हम अन्य विधाओं का अनुवाद देंगे और मलयालम दलित साहित्य का संक्षिप्त परिचयात्मक विकास क्रम भी पेश करेंगे.
हरि मृदुल की तीन कविताएँ Kathadesh
हरि मृदुल
मेकअप धुल चुका था आँसुओं से रुलाई थी कि अभी तक दब नहीं पा रही थी कान लगाने पर वैन के बाहर तक सिसकियाँ सुनाई दे रही थीं
हिस्से में आती धूप Kathadesh
कैलाश पचोरी
उस पारदर्शी, तरल और धवल और सुरीले एकांत में प्रविष्ट होने के बाद सच कहना क्या याद रहा तुम्हें? वह संलाप जो हुआ था कभी मेरे और तुम्हारे बीच ‘नैतिक और अनैतिक के बीच झूलता अपराध बोध’ ‘इतिहास को कुरेदना अनावश्यक’
डुमराँव के सबसे नामी घड़ीसाज थे भोंपू मियाँ Kathadesh
मदन केशरी
कहते हैं ऐसी कोई घड़ी नहीं जिसे भोंपू मियाँ दुरुस्त नहीं कर सकते थे ख़राब से ख़राब घड़ी जो कभी न चली बरसों से जिसके कल-पुर्जे सुई-काँटे जाम हो गये धूल-पानी-पसीने से अचानक टिक-टिक करने लगती उनकी उँगलियों के इशारे से आइग्लास के पीछे से तजवीज़ती उनकी बूढ़ी आँख पकड़ लेती बारीक से बारीक नुक्स
कथादेश (जनवरी 2010) Kathadesh
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विख्यात साहित्यिक पत्रिका कथादेश पहली बार इंटरनेट पर। पढ़िए जनवरी 2010 का अंक।
बहस - प्रगतिशील सवर्णों को भी जातीय उत्पीड़न की आत्मकथाएँ लिखनी चाहिए Kathadesh
अनिल चमड़िया
हम एक नई बहस शुरू करने जा रहे हैं. दलित रचनाकारों की तरह सवर्णों से ब्राह्मण को जातीय उत्पीड़न की आत्मकथाएँ क्यों नहीं लिखनी चाहिए. वर्ण व्यवस्था में दलितों की चेतना का ये हिस्सा ही नहीं बना कि उनके खिलाफ जातीय उत्पीड़न होता है. दलितों की लगभग प्रारम्भिक अवस्था में ही सवर्ण जातियों की नई पीढ़ी के सदस्य हैं जो अपने खिलाफ होने वाले जातीय प्रताड़ना का महसूस नहीं कर पाते जबकि जातीय प्रताड़ना के कारण ही वे आधुनिकता के साथ सहज और स्वाभाविक सम्बन्ध विकसित नहीं कर पाते हैं. कई सवर्ण लड़के अपने परिवार में जातीय उत्पीड़न की घटनाएँ सुनाते हैं तो उन्हें सुनकर मेरे रौंगटे खड़े हो जाते हैं. हालाँकि वे परिवार के भीतर जाति को लेकर सदस्यों के अलग-अलग दृष्टिकोण के संघर्षों के रूप में उनका बयां करते हैं. लेकिन मैं सोचता हूँ कि नये दौर के लड़के-लड़की के रूप में उन्‍हें देखा जाए तो उनके खिलाफ जातीय संघर्ष की गति को तेज करने में कारगर भूमिका अदा कर सकते हैं. आप इस बहस में दो तरह से हिस्सा ले सकते हैं. एक तो आत्मकथा लिखकर और दूसरा इस बहस में कुछ और बातों को जोड़कर इसे विस्तार दे सकते हैं.
प्रसंगवश - पुरुषोत्तम के प्रेम की अकथ कहानी Kathadesh
अर्चना वर्मा
कबीर की कविता और उनके समय के बारे में पुरुषोत्तम अग्रवाल की किताब अकथ कहानी प्रेम की को राजकमल प्रकाशन ने अपनी षष्ठीपूर्ति के उपलक्ष्य में लखटकिया पाण्डुलिपि पुरस्कार योजना के अन्तर्गत पुरस्कृत करके चर्चा के केन्द्र में ला दिया है जिसकी वह उचित रूप से अधिकारिणी भी है.
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कला के बीच नहीं आ सकतीं मजहब की दीवारें: बि‍रजू महाराज
कथक का पर्याय हैं बिरजू महाराज। 72 साल की उम्र में भी उनके हौसले जवां हैं। नृत्य उनके लिए साधना है, जिसमें लीन होने के बाद उनके पैरों की थाप से एक नयी दुनिया सजती है। कथक की धारा के साथ बहते-बहते कब वो बृजमोहन नाथ मिश्रा से पंडित बिरजू महाराज हो गये उन्हें खुद भी पता नहीं चला। नई पौध को कथक की बारीकियों से सजाने-संवारने में उन्हें बहुत आनंद आता है। उनसे खास बात की प्रतिभा कटियार ने।
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ज्योतिष