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डॉक्टरों का कहना था कि पाशा को Osteoprosis की बीमारी थी अर्थात उसकी हड्डियाँ खोखली हो चुकी थीं और बाकी उम्र शायद बिस्तर पर ही गुजरने की उम्मीद थी. जरा भी असावधानी से अगर वह गिर पड़ता या चोट ही लग जाती तो उसकी प्रभावित हड्डी या तो टूट जाती या चटख जाती. पाशा मेरा दोस्त भी था और पड़ोसी भी. लेकिन लंबे अर्से से शहरों-शहरों तबादलों के कारण मुझसे दूर रहा था. मगर रिटायर होकर जब वह अपने पैतृक घर आकर बिस्तर पर पड़ा रहा तो मेरे एकांत का कुछ हिस्सा उसके साथ हर शाम ही गुजरने लगा. होता यह कि मैं रोज शाम को जेब में दो सिगरेट डालकर और गली पार कर के पाशा के घर पहुँच जाता. थोड़ी देर में अन्दर से दो पापड़ और चाय आ जाती. हम दोनों इधर-उधर की बातें करते और चाय के साथ सिगरेट पीते. हम दोनों ही दिन भर में तीन सिगरेट पीते थे इसलिए शाम की चाय पर हमारी आखिरी सिगरेट का मजा भी कुछ और होता.
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‘‘उनके यहाँ मनीष कैसा लड़का है.’’
‘‘अच्छा नहीं है. कोई केस हो गया क्या?’’
‘‘नहीं!... नहीं!! ....शादी ब्याह की बात है. जो भी जानती हो बता दो.’’ इन्होंने फोन का चोगा डॉ. तिवारी के कान मे लगा दिया.
‘‘लफंगा है... भले घर की लड़की के लायक नहीं है. हाय-बाय वाला मॉड लड़का है. किसी कर्नल की बेटी के साथ रहता था. अपार्टमेंट लेकर दिल्ली में. बिना शादी किये. दो बार लड़की का अबार्शन हो चुका है. नीच है और क्या?’’
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‘‘लखनऊ में होगा .... लखनऊ में’’.... भैया जरूर बहुत जोर-जोर से बोल रहे थे क्योंकि रात के सन्नाटे में फोन से आती आवाज फोन के पास बैठे हम साफ-साफ सुन रहे थे-‘‘संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीटयूट ऑफ मेडिकल साइंस में. आपरेशन के समय तुम लोगों में से किसी को यहाँ रहना होगा- कौन रहेगा-वे तुम लोग आपस में तय कर लो. जैसे ही इंस्टीट्यूट वाले आने के लिए तारीख देंगे, मैं फोन करूँगा-मानसिक रूप से तैयार रहो तुम लोग...हाँ...’’
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बूँदें बिला जाती हैं
छाती की पथरीली दरारों में.
चूसकर सुखा दी जाती हैं मधुर संकल्पनाएँ
आत्म के अन्तरतम की,
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अच्छे लोगों से मैं हमेशा डरी रही हूँ
जब भी मैं सज्जनों को देखती हूँ
मुस्कुराने की कोशिश करती हूँ,
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बरगद का वह पुराना पेड़ कल गिर पड़ा
जब आखिरी चिड़िया ने अपना घोंसला छोड़ दिया,
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तब बनारस में नामवर जी काशी विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में कच्ची नौकरी पर थे. केदारनाथ सिंह और हम विद्यार्थी थे. केदारनाथ सिंह उनके पुराने मित्र थे और मैं उनका विद्यार्थी. बहरहाल हम तीनों काफी देर तक साथ साथ रहते. पता नहीं उन्हीं दिनों कहाँ से एक शब्द आ टपका! ज़ायका!
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घनश्याम उन्हें बार-बार झिंझोड़ रहा था और वे एक मासूम की तरह रह रहकर काँप रहे थे और उन्हें समझ में नहीं आ रहा था इसीलिए वे बार-बार कह रहे थे कि ‘‘कांई हुयो तो मैं कांई करयौ? दो चार कपड़ा बेच कर रोटी खा ली अर दारू पी ली.’’
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यूनिवर्सिटी: एक पाठ
एम. बी. मनोज
अंग्रेजी से अनुवाद: बजरंग बिहारी
परीक्षा अनुभाग को जाती
सीढ़ियों के मुहाने पर
अक्सर अकेला बैठा
सामने की तारकोल सड़क पर
रात में गिरी हुई
पत्तियाँ और इमलियाँ
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आहों में विलीन हो रही है गीले बालों के लिए एक फूल बेईमानी का
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