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जिस दिन से गाँव का नाम बदलकर ‘सर्वोदय ग्राम’ हो गया और नए - नए नारे गढ़े और पढ़े जाने लगे, उस दिन से शनिचर डोम के मन की सुसुप्त चिर अभिलाषा उसी प्रकार अंगड़ाई ले जाग उठी जिस प्रकार जलद - पटल में छुपा रवि घने स्याह बादलों को फाड़ बाहर निकल आता है.
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विख्यात साहित्यिक पत्रिका कथादेश पहली बार इंटरनेट पर। पढ़िए फरवरी 2010 का अंक।
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'अपना मोर्चा 'के बाद 1979 में ही प्रयोग के साथ दिल्ली में कहानियों की एक और प्रस्तुति करने का मौका मिला. जैसा कि मैंने अपने पिछले आलेख में उल्लेख किया थाभारतेन्दु नाट्य अकादमी के साथ पढ़ाने का एक वर्षीय अनुबंध 30 अप्रैल 1979 का खत्म हो गया और उसके बाद मैं दिल्ली चला आया था.
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फिल्म थ्री इडियट्स और उपन्यासकार चेतन भगत से जुड़ा विवाद अब शांत सा हो गया है. वैसे शायद यह विवाद था भी नहीं. यह संभवतः चेतन भगत की प्रचार-पिपासा थी जिसमें अधिक कीमत वसूलने (यानी निर्माता से पैसे लेकर करार करने) के बाद कुछ और पाने की आशा थी.
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जैसे पूत के पाँव पालने में पहचाने जाते हैं वैसे ही भारत रंग महोत्सव शुरू होने से पहले रानावि के प्रपंच उजागर होने लगे थे. देश के इस सबसे बड़े नाट्य महोत्सव ने देश के रंगकर्मियों-रंगदर्शकों से अपना रिश्ता सघन करने के बदले निरन्तरता में अपने को अलग-थलग किया है और अपनी प्रतिष्ठा खोता गया है.
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आतंकवाद के नाम पर एक के बाद एक फर्जी गिरफ्तारियों के बाद आजमगढ़ में इसका सबसे संगठित व सशक्त प्रतिरोध देखने को मिला. जब ज्यादातर अखबार व समाचार चौनल आतंकवाद की नर्सरी के नाम पर आजमगढ़ को आतंकगढ़के रूप में स्थापित करने में लगे थे वहाँ लोगों ने अपने गाँव के बाहर साम्प्रदायिकता फैलाने वाले पत्रकार यहाँ न आएका बैनर लटका दिया.
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मीडिया स्तंभ के अंतर्गत इस बार दो पत्रकारों की सामग्री हम प्रकाशित कर रहे हैं. हम चाहते हैं कि इस स्तंभ की जगह कथादेश में हम एक मीडिया खंड की शुरुआत करें. मेरा स्तंभ भी इसमें शामिल होगा. जो पत्रकार इस खंड में योगदान करना चाहते हैं कृपया वे प्रस्तुत सामग्री के अनुरूप मीडिया सामग्री तैयार करें.
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शिक्षा एवं शिक्षण संस्थाओं को लेकर हिन्दी में ज्यादा फिल्में नहीं बनीं. बहुत पहलेजागृतिबनी थी. जिसमें शिक्षक-छात्र सम्बन्ध को तत्कालीन परिस्थितियों में नये तरीके से समझने-समझाने का प्रयास किया गया था. बाद में शैतान समझे जाने वाले बच्चों को सुधारने वाले ट्यूटर को लेकर भी कुछ फिल्में आयीं (परिचय). हिन्दी फिल्मों में कॉलेज अमूनन रोमांस के अड्डों की तरह बनाये जाते रहे. ऐसे कॉलेज सिर्फ फिल्मों में ही हो सकते थे.
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प्रगतिशील सवर्णों के जातीय उत्पीड़न की बहस में कृपा शंकर चौबे के आत्मकथ्य का स्वागत है. बुनियादी तौर पर हमारा सामाजिंक ढाँचा वर्ण व जाति आधारित है.
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रंगमंच पर इतिहास के दो बड़े नायकों को ज्वलंत सामाजिक सवालों पर संवाद करतेसमस्याओं से भरे इतिहास के उस जटिल दौर में आगे की राह तलाशते तथा वैचारिक रूप गुत्थम-गुत्था होते देखना एक नया अनुभव है. ऐसा ही अनुभव राजेश कुमार का नाटकअम्बेडकर और गाँधी(देता है. अस्मिता थियेटर गु्रपनयी दिल्ली ने 29 नवम्बर 2009 को इस नाटक का मंचन लखनऊके संत गाडगे प्रेक्षागृह (उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी) में किया जिसकी परिकल्पना व निर्देशन अरविन्द गौड़ का था.
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