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नवरात्रि के पश्चात हवन का अत्याधिक महत्व है। मैं दुर्गा सप्तशती के कुछ ऐसे तथ्यों पर ध्यान दिलाना चाहता हूं, जो नव रात्रों के बाद हवन के समय प्रयोग में अवश्य लाने चाहिए। दुर्गा सप्तशति के 13 अध्याय हैं। हवन के समय दुर्गा सप्तशति के किस अध्याय में हमें क्या करना है और किस श्लोक में आहुति हवन में डालनी है, किसमें नहीं, यह बताने का प्रयास कर रहा हूं।
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नवरात्रि की शुरुआत 16 मार्च से हो रही है। इन पावन दिनों में मां दुर्गा का ध्यान कर सभी मनोकामनाएं पूरी की जा सकती हैं। दुर्गा सप्तशती भगवती दुर्गा का महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसका एक-एक शलोक स्वयंसिद्ध मंत्र है। इसमें बड़े-बड़े गूढ़ साधन-रहस्य भरे है। आमजन इसके जरिए मनोवांछित वस्तु या स्थिति सहज प्राप्त कर सकते है। यह कुछ विशेष मंत्र हैं-
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मां दुर्गा अपने भक्तों को कभी निराश नहीं करती और मां दुर्गा की उपासना के लिए नवरात्रि से बेहतर वक्त नहीं कहा जा सकता। शक्ति उपासना के क्षेत्र में नवरात्रियों का अनादिकाल से ही महत्व है। पुराणों में भी नवरात्रियों की उपासना का उल्लेख है। वैसे तो नवरात्रि प्रत्येक वर्ष चार बार आती है परन्तु प्रसिद्धि में चैत्र और आश्विन के नवरात्र प्रमुख माने गए हैं। चैत्र, अषाढ़, आश्विन और माघ के शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक नौ दिन नवरात्र कहे जाते हैं।
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सनातन धर्म के अनुसार जब बच्चों के दांत निकलने शुरू होते हैं और वह पहली बार दूध के अलावा ठोस आहार लेता है तब अन्नप्राशन संस्कार किया जाता है। शास्त्रों के मुताबिक अन्नप्राशन संस्कार में माता पिता शुभ मुहूर्त में जौ और चावल की खीर बनाकार देवताओं को निवेदित करके चांदी के चम्मच से शिशु को चटाते हैं।
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प्राचीन काल से सनातन धर्म में यह परंपरा है कि सभी धार्मिक और आध्यात्मिक कार्य कुश-आसन, मृगचर्म या व्याघ्रचर्म आदि पर बैठकर किए जाते हैं। हालाँकि शास्त्रों में नियम है कि मृगचर्म और व्याघ्रचर्म आदि के लिए पशु-हिंसा पाप है और जो मृग ख़ुद मर गया हो, उसके चर्म का प्रयोग किया जाना चाहिए।
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इस वर्ष 25 फरवरी को आमलकी एकादशी है। आमल एकादशी का व्रत फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को किया जाता है। आमल एकादशी का संबंध आंवले के पेड़ से है। आंवले के पेड़ में ईश्वर का वास होने की वजह से इस दिन उसके नीचे बैठकर भगवान का पूजन किया जाता है।
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भारतीय संस्कृति में यज्ञोपवीत का विशेष महत्व है। हिन्दू धर्म में विवाह से पूर्व यज्ञोपवीत को अनिवार्य माना गया है। प्राचीन काल में शिक्षा अर्थात विद्यार्थी-जीवन की शुरुआत यज्ञोपवीत से होती थी और आज भी कई लोग इस परंपरा का पालन करते हैं।
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उत्तर प्रदेश में महाशिवरात्रि के मौके पर इलाहाबाद में चल रहे विश्वप्रसिद्ध माघ मेले में शुक्रवार को हजारों भक्तों ने पवित्र संगम में डुबकी लगाकर शिव मंदिरों में पूजा-पाठ किया। वाराणसी स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर समेत प्रदेश के सभी शिव मंदिरों में तड़के से ही पूजा-अर्चना का दौर जारी रहा।
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महाशिवरात्रि का पावन पर्व 12 फरवरी को है। सभी सनातन धर्मी इस पर्व का बेसब्री से इंतजार करते हैं। उसका कारण यह है कि जो लोग प्रतिदिन की पूजा के लिए समय नही निकाल पाते, वे अगर शिवरात्रि पर एक बेलपत्र भी अपर्ण कर दें तो वे भगवान शिव की कृपा अधिकारी बन जाते हैं भगवान शिव ही ऐसे देव हैं, जिन्हें ‘इमोशनल ब्लेकमेल’ किया जा सकता है, लेकिन आपके इमोशन में सच्चाई भी झलकनी चाहिये।
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कुंभपर्व सनातन संस्कृति का एक ऐसा पर्व है, जो आत्ममंथन एवं शोधन का विराट् स्वरुप है। प्राय: लोग कहते हैं कि यह तो मात्र श्रद्धा एवं विश्वास की बात है परंतु श्रद्धा एवं विश्वास इतना आसान नहीं है कि कहीं भी और कैसे भी हो जाए। भारतीय संस्कृति में कुंभ एवं अर्धकुंभों का सर्वाधिक महत्व परिलक्षित होता है।
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